
भारत स्वस्तिक यात्रा की जम्मू स्थित रघुनाथ मंदिर में राम कथा में भगवान श्रीराम की विरासत और जम्मू-कश्मीर की आध्यात्मिक एकात्मता पर प्रकाश
डोगरा शासकों द्वारा स्थापित ऐतिहासिक मंदिर में पूज्य मोरारी बापू की राम कथा ने धर्म के आदर्शों, सनातन परंपराओं के संरक्षण तथा जम्मू, कश्मीर और हिमालय को जोड़ने वाले आध्यात्मिक संबंधों को रेखांकित किया
जम्मू, जम्मू-कश्मीर, 20 अक्टूबर, 2026। भारत स्वस्तिक यात्रा ने भारत की पवित्र आध्यात्मिक भूगोल की यात्रा को आगे बढ़ाते हुए 20 अक्टूबर को जम्मू के ऐतिहासिक रघुनाथ मंदिर में पूज्य मोरारी बापू की राम कथा के साथ अपनी यात्रा जारी रखी। मुख्य रूप से भगवान श्रीराम को समर्पित यह मंदिर क्षेत्र की धार्मिक एवं सांस्कृतिक विरासत का एक महत्वपूर्ण केंद्र और प्रमुख धार्मिक स्थल है। डोगरा राजवंश से इसका ऐतिहासिक संबंध तथा जम्मू में इसकी स्थिति, जो ऐतिहासिक रूप से कश्मीर से जुड़ा रहा है, यात्रा के इस पड़ाव को विशेष महत्व प्रदान करती है।
जम्मू के हृदयस्थल में स्थित रघुनाथ मंदिर, डोगरा काल से जुड़े प्रमुख मंदिर परिसरों में से एक है। इस मंदिर की स्थापना डोगरा राजवंश के संस्थापक महाराजा गुलाब सिंह ने आरंभ करवाई थी और उनके पुत्र महाराजा रणबीर सिंह के शासनकाल में, मुख्यतः 1853 से 1860 के बीच, इसका निर्माण पूरा हुआ। रघुनाथ स्वरूप में भगवान श्रीराम तथा माता सीता और लक्ष्मण जी को समर्पित यह मंदिर परिसर क्षेत्र के आध्यात्मिक जीवन में रामायण परंपरा के केंद्रीय स्थान को दर्शाता है।
मंदिर की विशिष्ट स्थापत्य शैली में सात प्रमुख मंदिर हैं, जिनमें से प्रत्येक पर एक शिखर बना हुआ है। इसके अतिरिक्त, परिसर में विभिन्न स्वरूपों में परमात्मा को समर्पित अनेक छोटे मंदिर भी हैं। यहां संग्रहित शालिग्राम शिलाएं, जिन्हें वैष्णव परंपरा में भगवान विष्णु का स्वरूप मानकर पूजा जाता है, मंदिर की धार्मिक महत्ता को और रेखांकित करती हैं। संस्कृत विद्या, पवित्र पांडुलिपियों और पारंपरिक ज्ञान से मंदिर का ऐतिहासिक जुड़ाव भी धर्मपरायण संस्थाओं को संरक्षण देने तथा भारत की बौद्धिक विरासत को सुरक्षित रखने में डोगरा शासकों की भूमिका को दर्शाता है।
रघुनाथ मंदिर का महत्व केवल एक उपासना स्थल तक सीमित नहीं है। परंपरागत रूप से ‘मंदिरों के शहर’ के नाम से विख्यात जम्मू लंबे समय से हिमालयी क्षेत्र और उसके पवित्र स्थलों तक पहुंचने का प्रवेशद्वार रहा है। उन्नीसवीं शताब्दी से डोगरा राजवंश के अधीन जम्मू और कश्मीर एक ही रियासत का हिस्सा रहे थे। यह ऐतिहासिक संबंध यात्रा के इस पड़ाव को व्यापक सांस्कृतिक संदर्भ प्रदान करता है। इस क्षेत्र की आध्यात्मिक परंपराओं में भगवान श्रीराम की उपासना, शैव और शाक्त परंपराएं तथा संस्कृत विद्या की समृद्ध विरासत शामिल हैं।
भारत के आध्यात्मिक और बौद्धिक इतिहास में कश्मीर का विशिष्ट स्थान है। कश्मीर शैव दर्शन, शक्ति उपासना और शास्त्रीय संस्कृत विद्वत्ता जैसी परंपराओं ने इसकी पहचान को समृद्ध किया है। यहां की पवित्र आध्यात्मिक भूगोल में अमरनाथ, हरि पर्वत स्थित शारिका देवी मंदिर, खीर भवानी और शंकराचार्य पहाड़ी जैसे प्रमुख स्थल शामिल हैं। इस व्यापक संदर्भ में जम्मू का रघुनाथ मंदिर उस साझा पवित्र भू-दृश्य का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जो उत्तर भारत के मैदानी क्षेत्रों से लेकर हिमालय तक विस्तृत है। इसी प्रकार, ‘कश्मीर से कन्याकुमारी’ की प्रचलित अभिव्यक्ति भारत के भौगोलिक विस्तार और सभ्यतागत एकात्मता को दर्शाती है।
पूज्य मोरारी बापू ने कहा, “कश्मीर का स्वस्तिक चार पवित्र सिद्धांतों में समाहित है—मातृ देवो भव, पितृ देवो भव, आचार्य देवो भव और अतिथि देवो भव। यहां मातृ देवो भव का स्वरूप माता वैष्णो देवी हैं, पितृ देवो भव का स्वरूप अमरनाथ है, आचार्य देवो भव का स्वरूप आदि शंकराचार्य हैं, जो इस भूमि पर आए, और अतिथि देवो भव का स्वरूप ऋषि कश्यप हैं, जो यहां अतिथि के रूप में आए। ये चारों मिलकर कश्मीर का स्वस्तिक बनाते हैं, जिसके केंद्र में उपनिषद रूपी बिंदु है।
एक साधु के स्वभाव में शांति, शक्ति, भक्ति, मस्ती, स्मृति, विरति, वैराग्य और विमल प्रभाव जैसे अनेक गुण समाहित होते हैं। विरति का अर्थ है विशेष रति, अर्थात परमात्मा के प्रति प्रेम और अनुराग का एक उच्चतर एवं विशिष्ट स्वरूप। साधु की शांति ही उसकी शक्ति है। परिस्थितियां कैसी भी हों, वह अचल, दृढ़ और अविचल बना रहता है।”
रघुनाथ मंदिर में आयोजित राम कथा भारत स्वस्तिक यात्रा की उस व्यापक परिकल्पना का हिस्सा है, जिसके अंतर्गत सनातन धर्म के संदेश के माध्यम से भारत की पवित्र आध्यात्मिक भूगोल, विविध आध्यात्मिक परंपराओं और राष्ट्रीय पहचान को केंद्र में लाया जा रहा है। देशभर के उपासना स्थलों, तीर्थों और ऐतिहासिक महत्व के स्थानों को जोड़ते हुए यह यात्रा उन चिरस्थायी परंपराओं को रेखांकित करने का प्रयास कर रही है, जिन्होंने भारत की सभ्यतागत निरंतरता को आकार दिया है।
यह यात्रा भारत की आध्यात्मिक विरासत और राष्ट्रीय पहचान को एक सूत्र में पिरोने की राष्ट्रीय परिकल्पना के साथ आगे बढ़ रही है। आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित चारों पीठों और ओंकारेश्वर को यात्रा में शामिल किया जा रहा है, जिसका आदि शंकराचार्य से गहरा आध्यात्मिक संबंध है। इसके साथ ही, यात्रा भारत के राष्ट्रगान में उल्लिखित प्रत्येक राज्य और नदी को भी समाहित कर रही है। इस मार्ग के माध्यम से विभिन्न क्षेत्रों के इतिहास और पवित्र परंपराओं को एक साझा सांस्कृतिक सूत्र में जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है।
भारत स्वस्तिक यात्रा का आयोजन पूज्य मोरारी बापू के मार्गदर्शन में संतकृपा सनातन संस्थान द्वारा किया जा रहा है।
रघुनाथ मंदिर में राम कथा के महत्व पर बोलते हुए मदन पालीवाल, चेयरमैन, मिराज ग्रुप एवं मैनेजिंग ट्रस्टी, संतकृपा सनातन संस्थान, ने कहा, “रघुनाथ मंदिर भारत की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक चेतना में भगवान श्रीराम के चिरस्थायी स्थान का प्रतीक है। भारत स्वस्तिक यात्रा के माध्यम से हमारा प्रयास लोगों को इस साझा सभ्यतागत विरासत से पुनः जोड़ना तथा धर्म, सद्भाव और सर्वकल्याण के मूल्यों को आगे बढ़ाना है।”
रघुनाथ मंदिर में आयोजित राम कथा भारत स्वस्तिक यात्रा के प्रथम चरण का हिस्सा है। इस चरण का शुभारंभ 10 अक्टूबर को कन्याकुमारी से हुआ था और इसका समापन 23 अक्टूबर, 2026 को केदारनाथ में निर्धारित है।
पूज्य मोरारी बापू की राम कथा सत्य, प्रेम और करुणा के मूल्यों पर आधारित है। उनके लिए यह यात्रा इन मूल्यों को देश के विभिन्न हिस्सों तक पहुंचाने तथा साझा आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक विरासत के माध्यम से लोगों को एक सूत्र में जोड़ने का अवसर है।
यात्रा के दौरान आयोजित राम कथा और इससे जुड़े सभी कार्यक्रम सभी के लिए खुले हैं। समावेशिता और सेवा की अपनी परंपरा के अनुरूप, प्रत्येक पड़ाव पर भंडारे का आयोजन किया जाता है, जहां प्रतिदिन निःशुल्क शाकाहारी भोजन प्रसाद के रूप में परोसा जाता है।



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