
प्राकृतिक आपदाओं से निपटने के लिए मजबूत जलवायु कार्रवाई जरूरी: राष्ट्रपति मुर्मू
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने कहा है कि हाल के समय में लगातार सामने आई प्राकृतिक आपदाओं ने यह स्पष्ट कर दिया है कि जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने के लिए मजबूत और प्रभावी जलवायु कार्रवाई आवश्यक है। उन्होंने कहा कि वैश्विक वैज्ञानिक समुदाय लगातार चेतावनी दे रहा है कि जलवायु जोखिम अब गंभीर स्थिति में पहुंच चुका है।
नई दिल्ली में आयोजित ‘पर्यावरण और जलवायु गतिशीलता के भविष्य’ विषयक सम्मेलन के समापन सत्र को संबोधित करते हुए राष्ट्रपति ने कहा कि इस चुनौती से निपटने के लिए स्थानीय, क्षेत्रीय और वैश्विक स्तर पर सभी हितधारकों के बीच सक्रिय सहयोग को मजबूत करना होगा।
उन्होंने कहा कि जलवायु परिवर्तन का खाद्य सुरक्षा, स्वास्थ्य और आजीविका पर भी गंभीर प्रभाव पड़ रहा है। जैव विविधता का नुकसान, जल संकट और भूमि क्षरण इसके कारण उत्पन्न हो रहे असंतुलन के प्रमुख उदाहरण हैं। राष्ट्रपति ने कहा कि जल-संकट वाले क्षेत्रों में स्थानीय समुदायों के लिए फार्म पॉड्स उपयोगी साबित हो सकते हैं।
प्रभावित समुदायों की भागीदारी जरूरी
राष्ट्रपति मुर्मु ने कहा कि जलवायु परिवर्तन जैसी जटिल चुनौती से प्रभावी ढंग से निपटने के लिए नीतियों और कार्यों का सुव्यवस्थित ढांचा आवश्यक है। इसमें सरकार और कानूनी विशेषज्ञों के साथ-साथ जलवायु परिवर्तन से सबसे अधिक प्रभावित समुदायों की सक्रिय भागीदारी भी सुनिश्चित की जानी चाहिए।
उन्होंने कहा कि ग्रामीण और वन क्षेत्रों में रहने वाले समाज, छोटे किसान, महिलाएं और अन्य संवेदनशील समुदाय प्राकृतिक आपदाओं का सबसे अधिक प्रभाव झेलते हैं। इसलिए उनकी जरूरतों के प्रति विशेष संवेदनशीलता जरूरी है।
पारंपरिक ज्ञान से मजबूत होगी जलवायु अनुकूलन क्षमता
राष्ट्रपति ने कहा कि पारंपरिक ज्ञान प्रणालियां तथा स्थानीय समुदायों की प्रथाएं और जीवन के अनुभव जलवायु परिवर्तन के अनुकूलन की क्षमता बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उन्होंने पारंपरिक ज्ञान पर आधारित जन-केंद्रित और समुदाय आधारित उपायों के माध्यम से जलवायु लचीलापन मजबूत करने पर जोर दिया।
उन्होंने कहा कि टिकाऊ वनीकरण भी जलवायु लचीलेपन को बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप जैव विविधता को बढ़ावा देने वाले वनीकरण प्रयास प्रभावी हो सकते हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि टिकाऊ वनीकरण का उद्देश्य केवल पेड़ लगाना नहीं, बल्कि स्वस्थ और आत्मनिर्भर पारिस्थितिकी तंत्र को पुनर्स्थापित करना होना चाहिए।
विकास और जलवायु कार्रवाई के बीच संतुलन जरूरी
राष्ट्रपति मुर्मु ने कहा कि विकासशील देशों को ऐसा रास्ता अपनाना चाहिए, जिससे विकास की गति बनाए रखते हुए जलवायु संबंधी चुनौतियों के प्रति लचीलापन बढ़ाया जा सके। जिम्मेदार जलवायु कार्रवाई की प्रतिबद्धताएं देश की विकास आवश्यकताओं और आर्थिक आकांक्षाओं के अनुरूप होने के साथ-साथ तकनीकी रूप से व्यवहार्य भी होनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि भारत ने आम नागरिकों, विशेषकर युवाओं को पर्यावरण संरक्षण से जोड़कर पर्यावरणीय जागरूकता बढ़ाने की दिशा में उल्लेखनीय कार्य किया है। भारत सरकार की ‘मिशन लाइफ’ पहल ने यह दिखाया है कि जनभागीदारी और सामुदायिक स्वामित्व के माध्यम से पर्यावरणीय पुनर्स्थापना की दिशा में सार्थक प्रगति की जा सकती है।
पर्यावरण संबंधी मामलों में एनजीटी की महत्वपूर्ण भूमिका
राष्ट्रपति ने कहा कि राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) पर्यावरण से जुड़े कानूनी मामलों में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। उन्होंने कहा कि अधिकरण ने बड़ी संख्या में विवादों का तेजी से निपटारा किया है और देश में नदियों, वायु गुणवत्ता तथा कचरा प्रबंधन से जुड़े मामलों में प्रभावी अनुपालन ढांचा विकसित किया है।
समापन सत्र को केंद्रीय विद्युत, आवास एवं शहरी विकास मंत्री मनोहर लाल, सुप्रीम कोर्ट की न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना, राष्ट्रीय हरित अधिकरण के अध्यक्ष न्यायमूर्ति प्रकाश श्रीवास्तव और सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने भी संबोधित किया।

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